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लोगों ने खूब मज़ाक उड़ाया, आज केंचुआ खाद की मदद से हर महीने 20 क्विन्टल से भी अधिक मशरूम उगाती है

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एक ऐसा भी समय था जब लोग मजबूरी में खेती करतें थे। कुछ लोग रोजी-रोटी चलाने के लिये शहरों की ओर निकल पड़ते थे और जो गांव में बच गए.. वे कृषि से जुड़ जातें थे। लेकिन कहते है, न.. समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता, यह हमेशा बदलता रहता है। पहले लोग अपना जीवन-यापन करने के लिये खेती करते थे वहीं आज खेती एक व्यवसाय का रूप ले लिया है। कृषि से संबंधित रोज नये-नये रोजगार उभर कर सामने आ रहें हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि खेती देश के युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।

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एक तरफ जहां पुरूष खेतीबारी के काम में आगे आ रहें है। सफलता का स्वाद चख रहें हैं। वहीं दूसरी तरफ देश की महिलाएं भी किसी काम में पीछे नहीं हैं। नये दौर में महिलाएं भी पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चल रही हैं। महिलाएं पुरूषो से किसी भी मामले में पीछे नहीं है इस बात को फिर से साबित कर दिखाया हैं अनुपम कुमारी ने।

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आइए जानतें हैं, अनुपम कुमारी की कहानी
अनुपम कुमारी (Anupam Kumari) बिहार राज्य के सितामढ़ी (Sitamadhi) जिले की रहनेवाली हैं। अनुपम स्नातक तक पढ़ाई की हैं। इनके पिताजी खेती का काम करतें थे। साथ ही वह शिक्षण का भी काम करतें थे। शिक्षक और किसान दोनों का काम करने के बाद भी उनकी अच्छी कमाई नहीं होती थी। इसलिए अनुपम के पिताजी ने शिक्षक की नौकरी छोड़ने का फैसला किया। इसके बाद वह खेती में सारा समय देने लगे। अनुपम ने स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने पिताजी के साथ मिलकर पारंपरिक तरीके से खेती न कर के वैज्ञानिक तरीके से कुछ नया करने का विचार किया।

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वैज्ञानिक तरीके से खेती कैसे किया जाता है इसके बारें में उनको जानकारी नहीं थी। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने के लिये अनुपम अपने पिता के साथ कृषि अनुसंधान केंद्र गईं। अनुपम ने मशरूम (Mushroom) की खेती और केंचुआ खाद के उत्पादन कैसे किया जाये, इन दोनों विषयों पर गहन अध्ययन किया। इसके अलावा उन्होंने खेती के अलग-अलग विधियों के बारें में जानने और सीखने के लिये पटना (Patna), सितामढ़ी (Sitamadhi) तथा दिल्ली (Delhi) के भिन्न-भिन्न संस्थाओं में जाकर इसका प्रशिक्षण लिया।

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अनुपम कुमारी (Anupam Kumari) ने अपना प्रशिक्षण पूरा कर गांव लौटने पर मशरुम की खेती करने की सोची। अनुपम मशरुम की खेती की शुरुआत 500 वर्ग फुट के खेत में सिर्फ 500 रुपये से की। हालांकि गांव में इसके पहले किसी ने मशरुम की खेती नहीं की थी। इन्सान अगर किसी अच्छे और नये काम की शुरुआत करता है तो उसके हौसले को बढ़ाना चाहिए ना कि उसके मनोबल को घटाना चाहिए। लेकिन अनुपम को उनके गांव के लोगों के द्वारा हौसला अफजाई ना कर उनको हतोत्साहित किया जाता था। मशरुम की खेती को गांव के लोग गोबरचट्टा कहते थे। वह अनुपम को जब भी खेती करतें देखते, कहतें थे, गोबरचट्टा उगा रही है।

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किसी ने सही कहा है, “अगर अपने लक्ष्य तक पहुचना है तो उसे दूसरों की नाकारात्मक बातों को नजरअंदाज कर देना चाहिए। इन्सान अगर दूसरों की निगेटिव बातों पर गौर करने लगेगा तो सफलता उसे कभी हासिल नहीं होगी।” अनुपम भी इसी रास्ते पर चली और गांव के लोगों की बातों को अनदेखा करती रही। अगर मेहनत सच्चे मन और सच्ची निष्ठा से किया जाये तो कामयाबी जरुर कदम चूमती है। अनुपम की मेहनत ने अपना असर दिखाया। अनुपम को मशरुम की खेती करने के 3 महीने में उन्हें 10 हजार रुपये की आमदनी हुईं।

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अनुपम कुमारी खुद से ही वर्मी कंपोस्ट भी बनाती हैं। इसको बनाने के लिये वह गेहूं के भुसे और फुस का प्रयोग करती हैं। अनुपम किसानों को वर्मी कंपोस्ट बनाने की विधि भी बताती हैं। वर्तमान में प्रत्येक 3 महीने में 50 क्विंटल मशरुम का विक्रय होता है। मशरुम की बिक्री से अनुपम को अच्छी आमदनी भी होती हैं। Anupam की सफलता से प्रेरणा लेकर गांव की लगभग सभी महिलाएं उनसे इस खेती के गुण सिखती हैं। मशरुम की खेती और केंचुआ खाद उत्पादन के साथ-साथ अनुपम ने मछली पालन तथा गार्डेनिंग का कार्य भी आरंभ किया हैं। गांव की महिलाओं के लिये ही नहीं बल्कि नयी युवापिढ़ी के लिये भी अनुपम एक प्रेरणास्त्रोत बन गईं हैं।

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